पाठ्यक्रम: GS3/बुनियादी ढांचे का विकास
समाचार में
- मध्य प्रदेश में आदिवासी समुदाय के लोग केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्हें बड़े पैमाने पर विस्थापन, अपने पुश्तैनी वनों के क्षरण तथा अपनी पारंपरिक पहचान के नुकसान की आशंका है।
केन–बेतवा लिंक परियोजना (KBLP)
- यह मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए एक प्रमुख जल-संसाधन विकास परियोजना है, जिसका उद्देश्य लंबे समय से चली आ रही जल-संकट और सिंचाई की समस्याओं का समाधान करना है।
- इस परियोजना के अंतर्गत केन बेसिन से बेतवा बेसिन तक जल स्थानांतरित करने की परिकल्पना की गई है। इसके लिए दौधन बाँध, एक लिंक नहर तथा उससे संबंधित अन्य निर्माण कार्य किए जाने हैं।
- यह नदी जोड़ो परियोजनाओं के लिए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना के अंतर्गत क्रियान्वयन चरण में प्रवेश करने वाली प्राथमिकता वाली परियोजना है।
- चरण : इस परियोजना के दो चरण हैं।
- चरण-I में दौधन बाँध परिसर तथा इससे संबंधित सहायक इकाइयों, जैसे निम्न-स्तरीय सुरंग , उच्च-स्तरीय सुरंग, केन-बेतवा लिंक नहर और विद्युत गृहों का निर्माण शामिल है।
- चरण-II में तीन घटक शामिल हैं—निचली ओर्र बाँध, बीना कॉम्प्लेक्स परियोजनाऔर कोठा बैराज ।

केन-बेतवा लिंक परियोजना (KBLP) के लाभ
- यह परियोजना मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के जल-संकटग्रस्त बुंदेलखंड क्षेत्र में सिंचाई, पेयजल आपूर्ति, रोजगार तथा बुनियादी ढाँचे को बढ़ावा देगी।
- यह सूखे के प्रति क्षेत्र की सहनशीलता, कृषि उत्पादन और आय में वृद्धि करने, आर्थिक विवशता के कारण होने वाले पलायन को कम करने तथा बाजारों, विद्यालयों एवं स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच में सुधार करने में सहायक हो सकती है।
- परियोजना से संबंधित सड़कों, पुलों और संपर्क-सुविधाओं के विकास से आसपास के गाँवों को भी अतिरिक्त लाभ प्राप्त हो सकते हैं।
- परियोजना का उद्देश्य जल-सुरक्षा और सामाजिक-आर्थिक लाभों के बीच संतुलन स्थापित करना तथा भूमि, पर्यावरण और सामाजिक प्रभावों का जिम्मेदार प्रबंधन सुनिश्चित करना है।
आकलन एवं स्वीकृति
- केन–बेतवा लिंक परियोजना (KBLP) के पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन वैधानिक स्वीकृति प्रक्रिया के अंतर्गत विस्तृत पर्यावरणीय अध्ययनों के माध्यम से किया गया है।
- परियोजना को कानून के अंतर्गत आवश्यक सभी वैधानिक स्वीकृतियाँ प्राप्त हो चुकी हैं। इनमें पर्यावरणीय स्वीकृति (2017), वन्यजीव स्वीकृति (2016), जनजातीय कार्य मंत्रालय से स्वीकृति (2017) तथा वन स्वीकृति (2023) शामिल हैं। ये स्वीकृतियाँ निर्धारित शर्तों और शमन उपायों के अधीन हैं।
- परियोजना के अंतर्गत विभिन्न पर्यावरण प्रबंधन उपाय, प्रतिपूरक वनीकरण, वन्यजीव संरक्षण तथा जैव-विविधता संरक्षण संबंधी उपाय भी लागू किए जा रहे हैं, ताकि चिन्हित पर्यावरणीय प्रभावों का समाधान किया जा सके और उन्हें न्यूनतम किया जा सके।
चिंताएँ एवं आलोचनाएँ
- जल का स्थानांतरण: केन नदी के जल को बुंदेलखंड के उन क्षेत्रों से मोड़ा जा सकता है, जो वर्तमान में इस नदी पर निर्भर हैं।
- निचले प्रवाह पर प्रभाव: प्राकृतिक जल प्रवाह में कमी से निम्न क्षेत्रों में पेयजल, सिंचाई, कृषि और भूजल पुनर्भरण प्रभावित हो सकते हैं, विशेषकर बांदा, महोबा एवं छतरपुर के आसपास के क्षेत्रों में।
- पर्यावरणीय प्रभाव: दौधन बाँध के निर्माण से बड़े पैमाने पर भूमि के जलमग्न होने, वनों की कटाई तथा केन नदी की प्राकृतिक नदी प्रणाली में परिवर्तन की आशंका है।
- दौधन बाँध से पन्ना राष्ट्रीय उद्यान एवं टाइगर रिजर्व का एक बड़ा हिस्सा जलमग्न हो सकता है। अनुमानतः लगभग 98 वर्ग किलोमीटर संरक्षित भूमि प्रभावित हो सकती है तथा लगभग 20–30 लाख पेड़ों को हटाना पड़ सकता है।
- प्रभाव आकलन से संबंधित चिंताएँ: आलोचकों का कहना है कि उपलब्ध पर्यावरणीय अध्ययनों में निम्न क्षेत्रों के गाँवों, जलापूर्ति, कृषि तथा पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों का पर्याप्त रूप से अध्ययन नहीं किया गया है।
- अनुसंधानों में यह भी चेतावनी दी गई है कि बड़े पैमाने पर जल का स्थानांतरण भूमि-वायुमंडल अंतःक्रियाओं तथा क्षेत्रीय वर्षा के स्वरूप को प्रभावित कर सकता है।
- क्षेत्रीय समानता: मुख्य प्रश्न यह है कि बुंदेलखंड के जल को क्षेत्र से बाहर ले जाने से पहले क्या उसका उपयोग स्वयं बुंदेलखंड की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया जाना चाहिए।
- विस्थापन एवं मुआवजा: परियोजना के कारण छतरपुर में लगभग 5,228 परिवारों और पन्ना में लगभग 1,400 परिवारों के सामाजिक रूप से विस्थापित होने का अनुमान है।
- मुआवजे तथा प्रभावित समुदायों को मिलने वाले लाभों के अपर्याप्त होने की धारणा को लेकर विरोध-प्रदर्शन भी हुए हैं।
निष्कर्ष
- केन-बेतवा लिंक परियोजना बुंदेलखंड की लंबे समय से चली आ रही सामाजिक-आर्थिक तथा जल संबंधी समस्याओं के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
- हालाँकि, इसकी सफलता काफी हद तक कठोर शमन प्रोटोकॉल, जैसे परिदृश्य-स्तरीय वन्यजीव संरक्षण, प्रतिपूरक वनीकरण तथा पारदर्शी पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन व्यवस्था, के प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि पर्यावरणीय क्षति मानव कल्याण से प्राप्त होने वाले लाभों पर भारी न पड़े तथा परियोजना से विकसित बुनियादी ढाँचा दीर्घकालिक कृषि स्थिरता और विद्युत उपलब्धता सुनिश्चित करने में सक्षम हो।
स्रोत: TH
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